जोमैटो विवाद का पूरा विश्लेषण और सच

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जोमैटो विवाद का पूरा विश्लेषण और सच

नफरत नहीं बल्कि विश्वसनीयता का अभाव है मुख्य वजह

Boycott zomato का ट्रेंड सोशल साइट्स पर गहराता जा रहा है। जोमाटो द्वारा ट्वीट “Food has no religion” ने अब तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया के अनुसार इस विवाद को लेकर अमित शुक्ला को खामखाँ निशाने पर लिया जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह बहुसंख्यक समुदाय से है। जोमाटो के पक्ष में कुछ बॉलीवुड सितारे भी मैदान में कूदते नजर आ रहे हैं।कुछ ऐसे मामले जहाँ बॉलीवुड और कुछ मीडिया वर्ग मौन रहना पसंद करते हैं क्योंकि आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हुए हैं।

पहला मामला

सपा नेता नाहिद हसन ने कैराना वासियों से अपील की थी कि सभी लोग बीजेपी समर्थकों का आर्थिक बहिष्कार करें।
मीडिया- चुप ,
बॉलीवुड-चुप

दूसरा मामला

सोशल मीडिया पर कुछ अल्पसंख्यकों का एक वीडियो कुछ दिनों पहले वायरल हुआ था जिसमे वहाँ के कुछ धार्मिक नेताओं ने अल्पसंख्यकों समुदाय को आर्थिक बहिष्कार करने की बात सामने आई।
मीडिया- चुप
बॉलीवुड -चुप

तीसरा मामला

अगस्त 6 2016 में एक घटना हुई जिसमे उज्जैन के 30 मदरसों ने इस्कॉन संस्था से खाने पर रोक लगा दी थी। मगर इस मामले में न तो बॉलीवुड में उछाल आता है ना तोह मीडिया वर्ग में।

हर आउट्रेज का अलग अलग पैटर्न बन चुका है। अल्पसंख्यक के लिए अलग आउट्रेज और बहुसंख्यक के लिए अलग। जोमाटो के विवाद को मीडिया खामखां उछाला जा रहा क्योंकि इसका संबंध नफरत ना होकर विश्वसनियता का अभाव है। मीडिया नैरेटिव में भी अब समानता का अभाव दिखाई देने लगा है।

चौथा मामला

मुंब्रा से नजदीक मुम्बरेश्वर मंदिर में महाप्रसाद में जहर मिलाने की बात सामने आई जिसमे एक बड़े वारदात को अंजाम देने का खुलासा भी हुआ। इस मामले में मंदिर के 40,000 हिंदू भाविक निशाने पर थे। जहर मिलाने के आरोपी यह सभी लोग आम नागरिक थे और आम जिंदगी जीने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के थे। जोमाटो का मामला के सीधे तार इस घटना से ही जुड़ा है।
जोमाटो का विवाद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सीधे मुम्बरेश्वर मंदिर के घटना से संबंध रखता है। यह विवाद का संबंध नफरत ना होकर विश्वसनीयता है।

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