लॉकडाउन में फिसड्डी साबित हो रही हैं केंद्र और राज्य सरकारें…

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लॉकडाउन में फिसड्डी साबित हो रही हैं केंद्र और राज्य सरकारें…

लॉकडाउन में फिसड्डी साबित हो रही हैं केंद्र और राज्य सरकारें...
लॉकडाउन में फिसड्डी साबित हो रही हैं केंद्र और राज्य सरकारें…
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने २५ मार्च २०२० से पूरे देश में लाकडाउन का ऐलान किया तब से देश बंद है और व्यवसाय बंद  हैं।
इस लाकडाउन की घोषणा करते हुये प्रधानमंत्रीजी ने यह आश्वासन दिया था की, देश में ज़रूरी चीज़ों की कमी नहीं होगी और सभी तबक़ों का ध्यान रखा जाएगा।
इस लाकडाउन में सबसे ज़्यादा अगर कोई परेशान हुआ तो वह थे जो लोग रोज़ कमाते हैं और खाते हैं अर्थात देश के मज़दूर और नए उद्यमी जिन्होंने हाल ही में अपने व्यवसाय की नींव रखी थी। अवस्था यह थी की जिस दिन से लॉकडाउन की शुरूवात हुयी उसके पहले से ही मज़दूरों का पलायन शहरों से गाँवों की ओर शुरू हो गया था। यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए की लाकडाउन की वाजिब तैयारी ना होते हुए भी लाकडाउन किया गया, उस समय यह तय था की बड़ी आबादी को कोरोना से बचाने के लिए यह फ़ैसला लिया जाना ज़रूरी था लेकिन इसके दूरगामी परिणाम को ध्यान में नहीं रखा गया, ना ही इसे योजनाबद्ध तरीक़े से ज़मीन पर उतारा गया।
चूक कहाँ हुयी?
सरकार ने चीन से सबक़ नहीं लिया यह जानते हुए की इस महामारी की संक्रमण की गति बहुत तेज़ है और लाकडाउन लम्बे समय तक चल सकता है। चीन में लॉकडाउन ३ से ४ महीने चला तब जाकर स्थिति उनके नियंत्रण में आयी। सरकार लॉकडाउन करके घोषणा करती रही कि, ज़रूरी सम्मान उपलब्ध कराए जाएँगे, कोई भी मकान मालिक किराया नहीं लेगा और कम्पनी मालिकों से आग्रह किया गया की वह अपने कर्मचारियों को पूरी तनख़्वाह दें और उन्हें नौकरी से ना निकला ना जाये। कोई भूखा ना सोए इसका पूरा ख़याल रखा जाएगा। तीन महीने की लोन किश्त आगे धकेलने का भी ऐलान हुआ लेकिन यह नहीं बताया गया की ब्याज का भी ब्याज लगेगा। लोगों को प्रति व्यक्ति ५ किलो राशन दिया जाएगा चाहे उनके पास राशनकार्ड हो या ना हो। लेकिन हम सब जानते हैं कि, बहुत कुछ ठीक उसके उलट हुआ जैसे हमने सोंचा था।
मकानमालिकों ने किराया वसूला, लोगों की नौकरी गयी, बिना राशन कार्ड वालों को राशन नहीं मिला, जिनके राशन कार्ड थे उनके राशन कार्ड में भी भ्रष्टाचार हुआ। सरकार की घोषणाओं के बावजूद कम्यूनिटी किचन नहीं शुरू हुये और जो भी कम्यूनिटी किचन शुरू हुए हैं वहाँ स्वच्छता का बिलकुल ध्यान नहीं रखा जा रहा है ना ही खाने की गुणवत्ता अच्छी है और तो और सोशल डिसटनसिंग का तो बिलकुल भी पता नहीं है।कम्यूनिटी किचन से बेहतर मज़दूरों को सूखा राशन दिया जाना एक बेहतर विकल्प था जिससे ववह ख़ुद अपना भोजन घर पर बना सकते थे इससे सोशल डिसटनसिंग का पालन भी होता और स्वच्छ तरीक़े से भोजन बनाया जा सकता था। केंद्र सरकार की ग़लती यह है कि, वह अपनी योजनाओं और घोषणाओं को ज़मीन पर उतार नहीं पायी।
महाराष्ट्र राज्य सरकार ने यह जानते हुये कि, मुंबई और पुणे जैसे अन्तर्राष्ट्रीय शहर हैं यहाँ  विदेशों से आनेवाले और जानेवाले लोग बहुत हैं एयरपोर्ट पर केवल बुखार नापना छोड़कर कुछ नहीं किया, विदेश से आनेवाले लोगों को क्वॉरंटीन नहीं किया गया, मुंबई की लोकल ट्रेनें बंद नहीं हुयी जिससे संक्रमण बहुत ज़्यादा फैल गया। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे नए थे उनके मुख्यमंत्री बनते ही छह महीने के भीतर कोरोना सक्रमण ने दस्तक दे दी। इसके पहले प्रशासन को चलाने का अनुभव ना होना और विधानपरिषद के रास्ते अपने मुख्यमंत्री पद को बचाने की उधेड़बुन ने उनके फ़ैसलों को बहुत प्रभावित किया। राजस्व कमाने के चक्कर में शराब की दुकानों को खोलना भी एक बहुत बड़ा आत्मघाती क़दम सरकारों ने लिया।
सामाजिक संगठन संवाद फाउंडेशन लोगों को भोजन और अनाज बाँटते हुये
सामाजिक संगठन मजदूरों और गरीब आदिवासियों को भोजन और अनाज बाँटते हुए…..
सबसे ख़राब अनुभव क्या है?
सबसे ख़राब अनुभव है मज़दूरों का शहरों से पलायन। इसमें सबसे ज़्यादा मार पड़ी दिहाड़ी मज़दूरों पर जो केवल दो दिन का पैसा अपने जेबमे लेकर चलते हैं। मकान का किराया, घर में राशन का ना होना और मालिकों के मुँह फेरने पर इनके पास कोई भी विकल्प नहीं बचा और वह अपने परिवारों को लेकर पैदल ही गाँव की ओर चल दिए इसके अलाव कोई रास्ता भी उनके पास नहीं बचा। बहुत सारे मज़दूरों ने लॉकडाउन की अनिश्चितता गाँव से अनाज बेंचकर पैसे मँगवाए और ट्रकों में भर-भर कर गाँव गए। गाँव जाने वाले मज़दूरों की यह दुर्दशा हुयी की कहीं वह रास्ते पर पैदल चलते हुए कुचले गये, कहीं ट्रक खाई में गिरी और कहीं ट्रक दूसरे गाड़ियों से टकराई और मज़दूर बेचारे बेमौत मारे गये। औरैया सड़क हादसा सबसे ताज़ा घटना है। ज़मीन पर मज़दूरों से बात करने पर यह भी पता चला है कि, मज़दूरों के पलायन को राजनीतिक स्वीकृति भी है, क्यूँकि लाक डाउन होते हुए भी उन्हें ना रोका जा रहा है ना उनके भोजन की व्यवस्था की जा रही है।
मज़दूरों की भावनाओं के साथ जबरजस खिलवाड़ भी हुआ है। ट्रेन चलने की घोषणाएँ कर दी गयीं, मेडिकल टेस्ट मुफ़्त होते हुए भी पैसे मज़दूरों से वसूले गये। केंद्र सरकार ने घोषणा की कि, मज़दूरों को फ़्री में ट्रेन से उनके गाँव पहुँचाया जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं टिकट के पैसे वसूले गए। १२०० की जगह कई हज़ार मज़दूर स्टेशन पर पहुँचे और लाइन में आगे लगाने के बहाने से पुलिसवालों ने भी पैसे लिए। राज्य सरकारों द्वारा दिए गए हेल्प्लाइन नम्बर बेमतलब साबित हुये।
मज़दूरों को महफ़ूज़ उनके घर तक पहुँचाने के लिये क्या किया जा सकता था?
जिस प्रकार वन्दे भारत योजना के तहत विदेशों से भारतीय लाए जा रहे हैं उसी तर्ज़ पर मज़दूरों को ट्रेन से उनके पैतृक निवास स्थानों पर भेजा जा सकता था। वो कैसे?
टोल फ़्री नम्बर की जगह एसएमएस, ईमेल और वहाटसप्प  का विकल्प ज़्यादा कारगर और आसान था और है। हर छोटे स्टेशन से दिन में दो और बड़े स्टेशन से चार से पाँच ट्रेनें प्रतिदिन चलायी जा सकट हैं। रेल्वे एक समय सारिणी और ईमेल आइडी, वहाटसप्प और एसएमएस का नम्बर साझा करे। लोगों को ईमेल, वहातसप्प संदेश और एसएमएस भेजकर रेजिस्ट्रेशन करने को कहा जाये और लोगों को उनके ईमेल, वहाटसप्प और एसएमएस पर उनके टिकट सीधे भेजे जाएँ लोगों से कहा जाए जिनके पास टिकट आए हैं वह तीने घंटे पहले स्टेशन पर आयें और वहाँ उनकी मेडिकल जाँच करके आगे उन्हें ट्रेन में भेजा जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं हुआ दूसरी बात अभी भी जो ऑनलाइन टिकट ख़रीदने के साथ ट्रेन की टिकट बुक कराई जा रही हैं वहाँ टिकट एजेंट की जेब तो भरेगी पहले ही ढेर सारी टिकट ख़रीदकर टिकट ब्लैक की जाएगी और जितना आसान मज़दूरों के लिए ईमेल, वहाटसप्प और एसएमएस विकल्प है उतना ही कठिन उनके लिए आइआरसीटीसी  टिकट ख़रीदन है। लेकिन ईमेल, वहाटसप्प और एसएमएस जैसे विकल्प के लिए प्रशासन को सही लोगों को सही टिकट भेजना आवश्यक हो जाता है और यह स्थानीय प्रशासन पर भार भी काम कर देता है और गरीब मज़दूरों का शोषण भी रोका जा सकता था।
सरकार ने अब क्या क्या किया है और क्या कर सकती थी।
सरकार ने बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकिज का ऐलान किया है लेकिन इसमें जो राहत है वह ज़्यादातर क़र्ज़ के रूप में उपलब्ध है उसकी जगह पर लोगों के और निर्धारित ख़र्चों को काम करने के लिए क़दम उठाने चाहिए थे। जैसे की बंद पड़ी फ़ैक्टरी के बिल को पूरी तरह माफ़ करना या उसको आधा करना, लोगों के लोन की किश्त और ब्याज दोनो को लॉकडाउन के रहने तक पूरी तरह से ना वसूलना, ऐसे कई सारे क़दम जो व्यक्तियों और छोटी व्यवसायिकों के फ़िक्सड कोस्ट अर्थात निर्धारित व्यय को ख़त्म या काम करके उन्हें राहत दे दी जाती।
इस लॉकडाउन की अच्छी बातें कौन सी रहीं।
लोगों ने फ़िज़ूल खर्ची को रोकने का मतलब जाना। अनायास छोटी छोटी चीज़ों के लिए लोन लेने के नुक़सान को समझा। बुज़ुर्गों द्वारा बार बार पैसे बचाने के बताए गए महत्त्व को समझा और यह जाना की गूटखा, पण तम्बाकू और शराब जैसी नशीले पदार्थों पर व्यय किए गए पैसे को बचाया जाता तो वह अपने पैसों को ऐसे कठिन समय में उपयोग कर सकते थे।
सामाजिक संगठनों ने, दानशूरों ने अनाज वितरण, भोजन वितरण और आर्थिक मदद करके सरकारों की नाकामी को बहुत हद तक ढाँक दिया और इस महामारी में हाहाकार मचने से भी बचा लिया।
सीएए और एनआरसी आंदोलन कि वजह से उपजी सामाजिक दूरी को बिना भेदभाव के सामाजिक संगठनों के द्वारा की गयी सहायता ने काफ़ी हद तक ख़त्म किया।
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