निरमा यूनिवर्सिटी के छात्रों ने महाविद्यालय का शिक्षा शुल्क कम करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट से लगाई गुहार…

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निरमा यूनिवर्सिटी के छात्रों ने महाविद्यालय का शिक्षा शुल्क कम करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट से लगाई गुहार…

 

निरमा यूनिवर्सिटी के छात्रों ने महाविद्यालय का शिक्षा शुल्क कम करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट से लगाई गुहार...
निरमा यूनिवर्सिटी के छात्रों ने महाविद्यालय का शिक्षा शुल्क कम करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट से लगाई गुहार…

गौरतलब है कि, निरमा विश्वविद्यालय ने १ जुलाई, २०२० को एक अधिसूचना जारी करते हुए विद्यार्थियों से पुरे वर्ष की सम्पूर्ण शिक्षा शुल्क ५ अगस्त, २०२० तक भरने की मांग की थी। अधिसूचना में यह भी कहा गया था कि, वर्तमान शैक्षणिक वर्ष की शुरुवात ६ जुलाई, २०२० ऑनलाइन लेक्चर से होगी। इसी अधिसूचना पर आपत्ति जताते हुए निरमा विश्वविद्यालयों के छात्रों ने गुजरात उच्च न्यायलय को पत्र याचिका लिखी है कि, वह इस अधिसूचना और इसके प्रभाव को तत्काल स्थगित कर दें।  

इस अधिसूचना के किन बिंदुओं पर छात्रों ने आपत्ति जताई है आईये जानते हैं।  
१. ऑफलाइन शिक्षा अर्थात कक्षा में दी जानेवाली शिक्षा की तुलना में ऑनलाइन पढाई ज्यादा खर्चीली है 
२. उन सुविधाओं पर भी पूरा शुल्क वसूला जाना जो ऑनलाइन पढाई में उपयोग नहीं होती 
३. कोरोना संक्रमण, लॉकडाउन और उसके वित्तीय प्रभावों को ध्यान में ना रखकर पुरे शुल्क की मांग करना 
४. वर्तमान परिस्थिति में विश्वविद्यालय के खर्च, आमदनी, उपकरणों के उपयोग एवं कोरोना महामारी को ध्यान में रखकर बिना संशोधन के छात्रों से पिछले वर्ष की तरह पूरे शिक्षा शुल्क की मॉंग करना

छात्रों ने पत्र याचिका में क्या लिखा है?

छात्रों ने  लिखा है कि, ऑफलाइन पढाई में जिन सुविधाओं और उपकरणों का उपयोग नहीं हो रहा है उसके लिए भी पूरा शिक्षा शुल्क वसूलना भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४ का उलंघन है और असंवैधानिक है।  
अधिसूचना में यह कहना की “ऑफलाइन शिक्षा अर्थात कक्षा में दी जानेवाली शिक्षा की तुलना में ऑनलाइन पढाई ज्यादा खर्चीली है ” पूरी तरह से अतार्किक, तर्कहीन और प्रकट रूप से मनमाना विचार एवं निर्णय है। अधिसूचना में ऐसे वक्तव्य तब और बेमानी हो जाते हैं जब उन्हें लिखते हुए कोरोना महामारी, लॉकडाउन और उसके विपरीत प्रभावों को ध्यान में ना रखा गया हो।  
छात्रों ने पत्र याचिका में ध्यान आकर्षित करते हुए लिखा है कि, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक विनियम के नियम ३४अ के अनुसार शिक्षा शुल्क विश्विद्यालय महानिदेशक, संचालक मण्डल के सदस्यों के साथ परामर्श करके निर्धारित करता है। विश्वविद्यालय की अधिकृत वेबसाइट के अनुसार संचालक मंडल की बैठक पिछले वर्ष २८ सितम्बर, २०२० को हुयी थी उसके बाद बैठक नहीं हुयी। इससे यह प्रमाणित होता है कि, मौजूदा अनिश्चित और गंभीर कोरोना संक्रमण काल में भी स्वेच्छा से शिक्षा शुल्क में बदलाव ना करते हुए पूरा शिक्षा शुल्क विद्यार्थियों से वसूलना चाहते हैं। 
इस पत्र याचिका में यह भी कहा गया है कि, ऑनलाइन शिक्षा ऑफलाइन शिक्षा से स्वस्त है और ऐसे में विश्वविद्यालय के खर्च और लागत में कटौती होती है।  इस कटौती से  प्राप्त लाभ को विश्वविद्यालय को विद्यार्थियों को भी देना चाहिए, और यदि ऐसा नहीं होता है तो विश्वविद्यालय कानून द्वारा तय मानकों से अधिक लाभ कमायेगा जो गैरकानूनी है।  
पत्र याचिका में “मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य, 2016 7 एससीसी 353” विवाद में उच्चतम न्यायलय के निर्णय के हवाला दिया गया है जिसमे उच्च्चतम न्यायालय ने कहा था विश्वविद्यालय इतना अधिक शुल्क नहीं ले सकता जो शिक्षा की आवश्यकता को पूरा करने के उद्देश्य से परे हो।

इसलिए विद्यार्थयों ने गुजरात उच्च न्यायलय से प्रार्थना की है कि, विश्वविद्यालय के शिक्षा शुल्क का वह हिस्सा कम किया जाये जो बिना सुविधा दिए वसूला जा रहा है और जिन विद्यार्थियों ने पूरा शुल्क भर दिया है उनका माफ़ किया हुआ अनुपातिक शुल्क उनको लौटा दिया जाए। I

 

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