गौतस्करी में लिप्त अल्पसंख्यकों के लिए पूरा मीडिया जगत तैयार , किसानों पर मौन क्यों?

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गौतस्करी में लिप्त अल्पसंख्यकों के लिए पूरा मीडिया जगत तैयार , किसानों पर मौन क्यों?

किसानों के 22 जानवरों के कत्ल पर वही मीडिया वर्ग दोहरा मापदंड अपनाती है।

क्यों नहीं चलाते किसानों के लिए कोई मीडिया ट्रायल

फिर एक बार गौतस्करी  का मामला प्रकाश में आया है।अबकी बार , 22 बैलों की चोरी के मामले में अब्दुल रहमान अब्दुल करीम कुरैशी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। सूत्रों के जानकारी पर जब पुलिस ने अब्दुल रहमान अब्दुल करीम कुरैशी के कौसडी के घर की जब तलाशी ली तब 11 चमड़ी के डिब्बे प्राप्त हुए। पुलिस निरीक्षक व्यंकटेश आलेवार ने जानकारी दी कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने सभी 22 बैलों की कत्तल करने की कबूली दी है। रविवार सुबह 10 पुलिस ने समाजमध्यम द्वारा लोगो से अपील की जिस किसी के जानवर चोरी हुए हैं वह सीधे पुलिस स्टेशन आए। आवाहन के बाद बोरी, कौसडी, कान्हड़, कुपटा, पांगरी, मारवाड़ी, कडसावंगी,कोक, माक, शेक, पिम्परी, रोहिला जैसे अनेक गाँव से किसान बड़ी संख्या में पुलिस स्टेशन पहुँचे। किसान बड़ी आशा के साथ आए थे कि उनके बैल उन्हें मिल जाएंगे मगर जब उन्हें पता चला कि उनके बैलों की कत्तल हुई है तो किसानों में आक्रोश निर्माण हुआ क्योंकि किसान पहले ही सूखे की मार झेल रहे थे । फिर बैलों को खरीदने में उनके पास पर्याप्त रकम न होने से वह पहले से ही चिंतित थे।

इस हादसे के पिछे चर्बी रैकेट की आशंका होने की बात बताई जा रही है। मंगलवार को और 4 आरोपियों को सुबह 4 बजे गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार आरोपी के नाम खदिर रशीद खान पठान, एजाज़ रहमान कुरैशी(कौसडी),राजू अबुशामा कुरैशी, अजहर अकबर कुरैशी है।किसानों ने पुलिस की प्रशंसा की है साथ साथ किसानों में आक्रोश भी है।

आज गौरक्षकों द्वारा कई पिटाई के मामले प्रकाश में आते है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियों में रहती है मगर जैसे ही गौतस्कर पकड़े जाते हैं तो वही मीडिया आखिर हफ़्तों हफ़्तों गरीब किसानों के लिए क्यों नॉन स्टॉप कवरेज नहीं करती? ऐसे कई सवाल सोशल मीडिया में उठ रहे हैं। गौहत्या बंदी कानून को और कठोर करने की जरूरत है क्योंकि मौजूदा कानून से गौतस्करों में कोई भय नहीं है। लोगो का कहना है की गौहत्याबंदी कानून उत्तर प्रदेश सरकार की तर्ज गैंगस्टर एक्ट या गुण्डा एक्ट के पर होना चाहिए जिससे आरोपी को आसानी से राहत नहीं मिल पाएगी। लोगो का कहना है कि गौरक्षकों की हिंसा के पिछे यह तस्कर और प्रशासन जिम्मेदार है क्योंकि अगर किसानों के जानवर कानून होने के बावजूद अगर तस्करी हो रहे है तो अपने जानवरो की हिफाजत करने के लिए किसान कब तक पुलिस सहारे रहेगी ?

 

 

स्रोत : 4 जून 2019 , सामना

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